Democracy

My friend Kumar Anand just sent me a poem that I think readers of Pragati Express might appreciate:

हे नेताओ, यह याद रखो,
दुनिया मूर्खों पर कायम है।
मूर्खों की वोटें ज्यादा हैं,
मूर्खों के चंदे में दम है।
हे प्रजातंत्र के परिपोषक,
बहुमत का मान करे जाओ!
जब तक हम मूरख जिन्दा हैं,
तब तक तुमको किसका ग़म है?

इसलिए भाइयो, एक बार
फिर बुद्धूपन की जय बोलो!
अक्कल के किवाड़ बंद करो,
अब मूरखता के पट खोलो।
यह विश्वशांति का मूलमंत्र,
यह राम-राज्य की प्रथम शर्त,
अपना दिमाग गिरवीं रखकर,
खाओ, खेलो, स्वच्छंद बनो!
अब मूर्ख बनो, मतिमंद बनो!

- गोपालप्रसाद व्यास

This is not to say that democracy is a bad thing, or that any other form of government is superior. It highlights, instead, the importance of also being a Republic, with a strong constitution to keep majoritarianism in check. Here, check out this fine essay by Shruti Rajagopalan, Democracy vs The Republic.

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